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क्यूँ नहीं मिलता।

सुनील देव

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हज़ारों घर हैं दुनियाँ में मेरा घर क्यूँ नहीं मिलता।।
        
                                                    
                            
जतन तो रोज़ करता हूं मुक़द्दर क्यूँ नहीं मिलता।।

वो मेरे नाम से वाकिफ़ जो होता मिल गया होता,,
मेरी आंखों के दरिया को समंदर क्यूँ नहीं मिलता।

कहीं बरसों की आदत भी किसी की छूटती देखी,,
मिटा दे दिल से यादें वो क़लंदर क्यूँ नहीं मिलता।।

गुज़र गई आधी से ज्यादा अभी तक फिर रहा यूँही
जहाँ मेरी भी कुर्सी हो वो दफ़्तर क्यूँ नहीं मिलता।।

रगों में दौड़ता होता तो मंज़िल मिल ना गई होती,,
दिल को जीत ले सारे वो सिकंदर क्यूँ नहीं मिलता।।

नहीं मुश्किल नहीं कुछ भी सुना था मैंने छुटपन में,
जो सब आसान कर दे वो धुरंधर क्यूँ नहीं मिलता।।

चलो अच्छा हुआ यारों के कहानी पूरी हो गई मेरी,
समझ सब आ गया है देव अकबर क्यूँ नहीं मिलता।
-सुनील देव
2 महीने पहले
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