ख़ुदा या अब तो मैने काफ़ी कुछ सह लिया होगा।।
जिसे जो कहना था वो सब कुछ कह लिया होगा।।
अब किस रोज़ की उम्मीद रखूँ यां से रुख़सत की,
लहू अपने बदन में जो भी था सब बह गया होगा।।
अगर कुछ ज़ख्म बाक़ी है तो वे भी दे देना मुझको
मेरा माँझी तो कब का अपने घर जा लिया होगा।।
मेरे हिस्से में क्या सब अपनो की ही ठोकरें लिखीं,,
जिसे जब चाहिए था मुझसे जो वो ले लिया होगा।।
मुझे यूँ कब तलक रखेगा इस दुनियाँ के कदमों में,
ज़हर लोगों का अब तक तो सब बह लिया होगा।।
कोई समझा ना समझेगा यहाँ सब के सब बहरे है,,
इसलिए कह रहा हूं रब अब क्या रह गया होगा।।
क्या फ़ायदा है ये सोचकर कुछ बाकी बचा है देव
पुराना घर जो पुरखों का था वो भी ढह गया होगा।
-सुनील देव