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जरूरत बने रहे

सुनील देव

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            घर चलाने के लिए बस जरूरत बने रहे।।
        
                                                    
                            
तीज़ त्यौहार आए तो तिजारत बने रहे।।

हर कोई अपने आप में मशग़ूल हो गया,,
और हम थे के दहलीज़ पे मूरत बने रहे।।

आंखों के सामने ही सब कुछ लुटा दिया,,
फिर भी नज़र में सबकी बदसूरत बने रहे।।

कस्ती संभालने में ही गवाँ दी तमाम साँस,,
तूफ़ाँ में हौंसलों के हाथ कसरत बने रहे।।

जो कुछ कमाया उम्र भर वो भी बचा नहीं,,
और सबकी नज़र में हम मुशर्रफ़ बने रहे।।

महफ़िल में कोई जानता न मानता कभी,,
बेकार ही महफिलों की सदारत बने रहे।।

अब कौन पूछता है ग़म में किसी को देव,,
हम यूँही दुनियादारी में फज़ीहत बने रहे।।
-सुनील देव
3 महीने पहले
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