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हर एक आदमी।

सुनील देव

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इक दिल बचाए चल रहा हर एक आदमी।।
        
                                                    
                            
ग़म को ही ढोए चल रहा हर एक आदमी।।

अबके जो बंद हुई तो फिर न जाने कब खुले,,
पलकें सर उठाए चल रहा हर एक आदमी।।

सर पे सिवाए बोझ के अब कुछ नहीं बचा,,
सांसों को बचाए चल रहा हर एक आदमी।।

आए ना काम उम्र भर मोहब्बत के उसूल भी,,
यादों को सजाए चल रहा हर एक आदमी।।

वादाखिलाफ़ी ख़ून में क्या लाज़मी थी जो,,
खुद को बचाए चल रहा हर एक आदमी।।

अरमाँ कुछ मिटते नहीं बारिश से वक़्त की,,
दिल में घर बनाए चल रहा हर एक आदमी।।

क्या सोचकर के बारहा तुम घबरा रहे हो देव,,
हाथों को सर उठाए चल रहा हर एक आदमी।।
-सुनील देव,
एक महीने पहले
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