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फिर से चढ़ गया।

सुनील देव

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उतरा ना रात का ख़ुमार फिर से चढ़ गया।।
        
                                                    
                            
कैसा है इश्क़ का बुखार फिर से चढ़ गया।।

हर कोई जानता था मगर सुनता कौन था,,
गैरो पर कर के एतबार फिर से मर गया।।

किसे मिला जो तुझे मिलेगा सुकून इश्क़ में,,
अपने ही घर में कर दरार छत पे चढ़ गया।।

मेरे मालिक मेरे हिस्से में क्या दर्द ही हैं बस,,
आफ़ताब आया बार बार सर पे चढ़ गया।।

उस नाम के सिवा मुझे क्यूँ कुछ ना सूझता,,
क्या था के क्यूं था बेक़रार लेके मर गया।।

हाथों में हाथ होता तो कट जाती ये हयात,,
उम्मीद ए तल्ख़ एतबार फिर से चढ़ गया।।

क्या ढूँढता है रात दिन क्यूँ दर बदर है देव,,
गुरूर पर हो कर सवार फिर से मुड़ गया।।
-सुनील देव
3 महीने पहले
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