मस्ज़िद में पी शराब या तू मैकदे में पी।।
लेकिन मेरे हबीब बस दिल लगा के पी।।
क्या जाम तोड़ता है यार पीने के बाद तू,,
जो भी हो मगर नशा सर पे चढ़ा के पी।।
इक ज़ाम ऐसा हो के जो भूले ना उम्रभर,,
खुशबू बदन में रंग फ़िज़ा में उड़ा के पी।।
क्या बात बात पे मेरी गिनाते हो खामियां,,
आ बैठ मेरे क़रीब तू भी सर उठा के पी।।
क्या जाने फिर ये पल आए ना लौट कर ,,
जब तक है दम में दम के जी लगा के पी।।
सहबा में किसी शबाब से कम नशा नहीं,,
तू बात मेरी मान के उस को भुला के पी।।
पीने का यहां वक़्त ना कोई साल आएगा,,
जो भी मिले नसीब से देव सब उठा के पी।।
-सुनील देव