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चेहरे में दिखती हैं।

सुनील देव

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक शिकायत एक शिकन सी हर चेहरे में दिखती हैं।।
        
                                                    
                            
किससे करें उम्मीद वफ़ा की रूह गुम घेरे में दिखती है।।
सुबह से लेकर शाम तलक बस यही सोच के जिंदा है,,
सस्ती अब कोई चीज़ नहीं जो कम फेरे में बिकती है।।
बोझ लिए कांधों पर आदम आख़िर कितनी दूर चले,,
थकन रगों में आँख में लाली ख़म चेहरे में दिखती है।।
एहसानों के बोझ तले भी आख़िर कब तक सफ़र करे,,
किस किसकी सुननी पड़ती हैं नम चेहरे में दिखती है।।
जिम्मेदारी इतनी सर पे के कुछ कह पाए ना सह पाए,,
पाँव पड़ी इतनी जंजीरें के हमदम पहरे में दिखती हैं।।
आगे क्या उम्मीद करें हम जो गुज़री बस तीखी गुजरी,,
कितना सोई है रातों को ये दरहम चेहरे में दिखती है।।
आईनें से बात करूं तो ये छलक छलक जाती हैं देव,,
बाहर से सब ठीक लगे पर बरहम गहरे में दिखती हैं।।
-सुनील देव
एक महीने पहले
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