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आँख में रहता कोई।

सुनील देव

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अब शफ़क़ में ही असर ना चाँद में रहता कोई।।
        
                                                    
                            
दिल में ही कुछ शोर है ना आँख में रहता कोई।।

हर तरफ़ तन्हाई है बस ग़म की चादर ओढ़कर,,
हर कोई ख़ामोश है यां ना बात पे हंसता कोई।।

जल गया जो ज़िस्म था कल रात उसकी याद में,,
क्या करेंगे ढूंढकर अब ना ख़ाक़ में रहता कोई।।

हर कदम पर खुद ब खुद ही फांसिलें बढ़ते गए,,
अब कोई ख़्वाहिश रही ना याद में रहता कोई।।

झील के उस पार है ना कुछ झील के इस पार है,,
कैसे दिन है आ गए अब ना साथ में रहता कोई।।

क्या किसी को दोस देंगे कोई भी तो कम नहीं,,
सब चले गए छोड़ कर ना ख़्वाब में रहता कोई।।

क्या किसी से पूछते देव थक गए तो रुक गए,,
ज़हन में सवाल है कुछ ना जवाब में रहता कोई।।
-सुनील देव
12 घंटे पहले
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