शायद प्रेम की जगह बदल गई है…
कभी मैं तुम्हारी दुनिया का
सबसे खूबसूरत हिस्सा हुआ करती थी,
मेरी छोटी-सी खुशी भी
तुम्हारे लिए बहुत मायने रखती थी।
तुम्हारा परिवार तब भी था,
तुम्हारे रिश्तेदार तब भी थे,
मैंने कब रोका था तुम्हें,
ये तो तुम्हारे अपने ही थे।
तुम्हारे रिश्तों को मैंने
अपने रिश्तों सा अपनाया था,
तुम्हारी खुशियों में खुश होकर
हर रिश्ता दिल से निभाया था।
फिर जाने कब ये रिश्ते
तुम्हारे दिल के और करीब हो गए,
और मेरे हिस्से के एहसास
जाने क्यों थोड़े दूर हो गए।
अब उनकी हर बात सही लगती है,
मेरी हर बात में कमी दिखती है,
उनकी नाराज़गी तुम्हें बेचैन करती है,
मेरी नाराज़गी बस गलती दिखती है।
अजीब सा बदलाव है ये,
समझ नहीं आता क्या हो गया,
जो कभी मेरी खामोशी समझता था,
वो आज मेरी बातों से भी अनजान हो गया।
मैंने कब कहा कि अपनों को छोड़ दो,
या रिश्तों से अपना नाता तोड़ दो,
बस इतना चाहा था हर बार—
उन सबके बीच मेरा हाथ भी थामे रहो यार।
प्रेम आज भी है, कम नहीं हुआ,
बस शायद उसका रंग बदल गया,
तुम्हारी दुनिया वही है पहले जैसी,
बस उसमें मेरा कोना बदल गया।
सबसे ज्यादा दर्द इस बात का है,
कि मैं आज भी तुम्हें उसी प्यार से देखती हूँ,
और तुम मेरी हर बात में
बस मेरी कमी खोजते हो।
शायद रिश्ते खत्म नहीं होते,
बस उनकी जगह बदल जाती है,
और कभी-कभी इंसान वही रहता है…
बस उसकी अहमियत बदल जाती है।