विज्ञापन

क्षणभंगुर

Samir Verma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नौ सौ नंबर की बस थी, पहुंची स्टॉप थी।
        
                                                    
                            
भीड़ बड़ी थी, मगर खिड़की खुली थी।
खिड़की में खुले-खुले से कुछ अधखुले,
खुल-खुल कर कुछ खुल रहे,
कुछ बंद हो होकर खुल रहे नयन थे।
इधर भी, निर्निमेष निस्पंद निहारते निरखते,
विकल विह्वल बेताब बेचैन नयन थे।
फिर, पलक उठी पलक झुकी, पलकों पर
नईपलक को पलक पलकाते पलक अपलक थी।
नयनों का नयनों से मिलन सम्मिलन हुआ।
लोचन का लोचन से गोपन संभाषण हुआ।
मौन मधुर मुक मुस्कानों में मुखरित हुआ।
तभी बस में मोशन हुआ, बस खुल गई .....
भाग भाग, दौड़ दौड़, बायां पैर, दायां पैर,
बायां हाथ, दायां हाथ, चढ़ चढ़, उतर उतर,
हट पीछे, चढ़ ऊपर, पकड़ा पकड़ा, छूटा छूटा----------
वह तो, धरा पर धड़ाम से धराशायी हो गया था,
धूल धूसरित धूसर धूल में धंसा पड़ा था,
ख्वाहिशों के ख्वाब खलक खामोशियों में खो गए थे,
समस्त संजोए स्वप्न स्तब्ध सन्नाटे में सो गये थे,
पलकों पर पले प्यार पल में पराए हो गए थे,
चित्त-चोट से चेतना चिर-निद्रा में सो गई थी,
सांस में आस न जीवन में उल्लास शेष था।
तभी अबोध को बोध हुआ, प्रबल प्रभावी प्रबोध हुआ,
सुधांशु शीतल सुधा सकल सर्वत्र समभाव बिखराता,
पात्र हो या अपात्र, निज पात्र में प्रतिबिंब पा पुलकित पाता,
नित्य नियंता का निखिल निमित्त यह नैसर्गिक उपहार है।
भ्रम है तेरा, तू इसे सिर्फ अपना ना अधिकार मान लें।
पाया क्षण भर सही, तू इसे अपना सौभाग्य स्वीकार ले।
‘क्षणभंगुर’ संसार है, सत्य शाश्वत मान लें,
- समीर कुमार वर्मा

 
3 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all