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जीवन धारा

Samir Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी कल-कल कलोल करती मैं कलनादिनी की
        
                                                    
                            
छल-छल छलकती छटकती छन्दमयी छलछला थी।
प्रपात प्रपतित हो पाषाणों से, थी पावन पद्म पुलीनों के पांव पखारती,
विहसति थी तब वसुधा, वन वीथिका, विहग वल्लरी विपुल वादियां थीं।
कलरव करते थे कपोत, कलकंठ, कुहुक, कुसुम, कोमल कलियां थीं।
स्नेहमयी सुभग सहोदर सरिताएं तब संगीत सुमधुर सुनाती थीं।
अंजुलिभर आब अधर आचमन कर मेरा, आंगतुक अमृततुल्य बता जाते थे।
शीतल शुचि जल की श्लाघा में शत-शत सब शीश नवा जाते थे।
अप्रतिम आत्मीय अनुराग दे मुझे, आशीष आप्लावित कर जाते थे।
इठलाती इतराती ईशित्व पर तब अपने, मैं इवे बहे चली जाती थी।
सुखद सुहाना स्वप्न उर संजोए, सुरमयी सुधा सर्वत्र सरसाती थी।

पर, हाय! पूर्वनियत पाया प्रारब्ध परिवर्तन का, पुरुष के प्रकर्ष से पतन का!
सूनसान सन्नाटों में पृथक पायी, सिसकती शिथिल सिमटी सरिता सारी,
महरुम मधुर नाद, अस्वाद रही, मिल मायूसी मौन मलीन मेरी खार धार हुई,
अनागत अतिथि, अपेय अम्बुधार हुई, अचल अंधियारा, अवसाद अंकपाश रही,
आस विश्वास न आकांक्षा अब अशेष रही, बेराह, बेमंजिल, बेनाम, बेअस्तित्व बही,
आलोड़ित करती अकुलाए अंतस के अंतर्मन को आवाज उठी, क्यों बही, क्यों अब रही?

अरे, नहीं। धर्म बहना धरणी की धारा का, निश्चिल नित्य नैसर्गिक नियम नियति का,
हर पिंड, लघु पिंड को प्रभु ने परस्पर पावन परम प्रकल्पों की पूर्ण परिणति में ढाला।
हे धारा ! विह्वल विकल न हो तू वसुधा पर, हर कृतित्व कालजयी महान तुम्हारा,
पावन पौरुष तेरा अंबर चूमेगा, विकट वर्तमान ही होगा भविष्य का मधुर मल्हार तुम्हारा।।
-समीर कुमार वर्मा
 
एक महीने पहले
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