विज्ञापन

गुजरे हुए दिन

Sadiya khan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            गुजरे हुए दिनों के सारे सवालात पर
        
                                                    
                            
रो के हंस पड़े हैं माजी की याद पर

सावन की एक बूंद जैसे तन पे गिरे है
वैसे ही बरस जाता इश्क़ मेरी जात पर

तुम भूल कर भी ना भूले ये ही जीत है मेरी
वरना हार मेरी हो जाती तेरी याददाश्त पर

इश्क़ में जला है कुछ राख हुआ होगा
सब सोना नहीं बनता है इस आग पर
3 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Aditya Mishra

1 कविता

View Profile

Anil Pandey

436 कविताएं

View Profile