प्रातः विलुप्त हुई संध्या होने को है,
मनुष्य अपना संयम खोने को है।
सब्र का वह धागा टूट गया,
और मन संसार से रूठ गया।
समय का चक्र जब ऐसा पलटा,
समाज का असली रूप झलका।
जिन बंधनों का कभी कोई तोल नहीं था,
आज उन्हीं का कोई मोल नहीं है।
रीत यही है, दस्तूर यही है,
उगते सूरज की हर चौखट पर नमन की तैयारी होती है।
बाकी ढलती हुई परछाई की तो
सिर्फ गमन की तैयारी होती है।
बिना गुणों के संसार को किसी से लगाव नहीं होता,
और यह मानने को मनुष्य कभी तैयार नहीं होता।
किसी ने मुझसे पूछा,
"तुम क्यों घंटों शीशे को ताकती हो?”
अब कैसे बताऊँ,
रोज़ मैं खुद के अंदर झाँकती हूँ।
लोगों के पीछे नहीं,
खुद के पीछे भागा करो।
रोज़ अपने अंदर
एक नई शख्सियत को तलाशा करो।
— सान्वी दुबे