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ख्वाब

S. Mukesh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बस इत्ता सा ख्वाब !
        
                                                    
                            

तू कभी आसमां बन जा ...
मैं तारा बन तेरे सीने पर चमकूं !
तू कभी बाग बन जा ...
मैं तितली बन तुझ पर मंडराती फिरूं
तू कभी सागर बन जा...
मैं लहर बन तेरी बाहों में अठखेलियां करूं....
तू कभी जंगल बन जा
मैं तुझ में भटक खुद का वजूद तलाशती रहूं...
तू कभी रेगिस्तान बन जा
मैं प्यास बन तेरी मृगरीचिका में भटकती रहूं...
तू कभी वक्त बन जा
मैं लम्हा बन तुझ से गुज़र कर खत्म हो जाऊं...
तू कभी इबादत बन जा
मैं मन्नत बन बस पूर्ण हो जाऊं...
तू कभी प्रेम बन जा
मैं 'तू ' बन फिर सदियों के लिए 'तू ' ही हो जाऊं !
-सुजाता गुप्ता


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले
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