प्रेम ने परमात्मा को अपने भीतर
आत्मसात किया था ।
नि:संदेह, दैवीय था वह क्षण,
जब दो प्रेमियों ने प्रणय स्वीकार कर,
एक चुंबन को जीया था।
-सुजाता
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