मुफ़्त के लफ़्ज़
मुफ़्त की निगाहों से यूँ न देखा करो,
डर लगता है, कहीं ये तन-बदन
बिक न जाए तुम्हारी पलकों से।
मुफ़्त के लफ़्ज़ों से यूँ न सताया करो,
डर लगता है, कहीं ये मन
खो न जाए तुम्हारी धड़कनों में।
यूँ ही मुस्कुराहट मेरी
यादों में बाँध रखी है,
अब और न बाँधो उसे
अपनी इन ज़ुल्फ़ों में,
कहीं हम इस दरिया में
डूब ही न जाएँ।
डर लगता है अपनों के
इस अपनेपन से,
कहीं इन मुफ़्त की बातों में ही
हम खुद को न भूल जाएँ।
ये प्रेम का दरिया भी बड़ा अजीब है,
डर है इतना न डूबूँ
कि खुद में ही स्वलीन न हो जाऊँ।
- रूपेश कुमार साहू