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हिंदी कविता

RUPESH KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चलती फिरती चींटी कहती मेहनत कर सुख पाना सीखो,
        
                                                    
                            
अगर जल में गिर जाओ तो,हाथ पांव हिलाना सीखो।
चींटी का देखो कमाल, ले चली खाने को दाल।
दाल का कण है बड़ा,मेहनत करती है कड़ा।
एक आशियाना उजड़ा तो क्या दूसरा फिर बना लेंगे?
एक रास्ते खोए तो क्या दूसरा तलाश लेंगे?
हमेशा रहती है मेहनत में मगन,
इनका कोई नहीं रहता है गम।
मेहनत के अलावा कोई नहीं करती है बात
कार्य करें दिन हो चाहे रात।
चलती है सब एक दूसरे के कतार में
देखो कितनी सहमति है इनके प्यार में।
एक बिखरे तो सब बिखर जाए,
ऐसी एकता किस प्राणी में पाए।
कल की बात छोड़ आज की बात करती है,
जब हो सवेरा तब नई जिंदगी की शुरुआत करती है।
कितना ही ऊंचा क्यों ना हो मंजिल उस पर चढ़ जाती है?
रास्ते में बधा क्यों ना हो आगे की ओर बढ़ जाती है?
अगर कोई इनका घर फोड़े तो दूसरा बना लेती है,
किसी पर क्रोध न करके अपनी जिंदगी बसा लेती हैं।
चींटी है छोटा जी पर ज्ञान बहुत बड़ा दे जाती है,
मानव को प्यार और मेहनत का सिख दे जाती है।..... 
-रुपेश परदेशी
2 महीने पहले
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