पक्षियों के लिए संदेश
जिस वृक्ष की डालियों पर डाल कर अपना बसेरा,
तुम खुले, बेख़ौफ़ होकर ये जो खुले आसमान की सैर करते हो,
जब थक-हार कर आते हो, तो वृक्ष अपनी पूरी तत्परता से तुम्हें आगोश में भरता है,
तुम्हें तुम्हारा घोंसला सुरक्षित हवाले करता है।
और यही सिलसिला कई महीनों चलता है,
जब ऋतुएँ बदलती हैं, दिन पतझड़ के आते हैं,
तब तुम अपना ठिकाना, वृक्ष को ठूँठ पाकर, अपना ठिकाना मत बदलना!
धैर्य रखना, विपदा की यह रातें भी ढल जाएँगी।
हो सके तो खुले आसमान से एक अपील करना—
सूरज से कहना, "तुम तनिक तेज कम करो, छाँव का आंचल फैलाओ,"
बादल से कहना, "हे मेघा, जरा बरसो, इस सूखी डाली को तृप्त करो।"
वृक्ष से कहना, "तुम तनिक धीरज धरो,
अभी वसंत आएगा, पुनः नए-नए पत्ते लहलहाएँगे,
शाखों पर फिर से बहार आएगी।"
क्योंकि जो उजड़ चुका है, उससे इतना ही कह मात्र देना—
विश्वास का एक बीज, राख में भी अंकुरित हो जाता है,
वक्त का हर घाव भर जाता है,
वही स्पर्श, वही छाँव, जीवन को पुनः जीवित मात्र कर देता है।
ठीक उसी प्रकार,
जब जीवन के पतझड़ में अपने भी दूर होने लगें,
तो अपनों का साथ मत छोड़ना,
क्योंकि संघर्ष के इन पलों के बाद ही,
सुख के नए वसंत की असली शुरुआत होती है।
-रूपा कुमारी