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मेरा गांव मेरी संस्कृति मेरा जीवन

Ronak Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हम पैसो दौलत शोहरत के लिए अपनो से झगड़ा करते है।
        
                                                    
                            
बस अपनी मक्कारी पे खुश होते थे की हम काम तो तगड़ा करते है।
आज पैसो की कोई बात नही, बस अपनो का ही साथ सही ,
तभी तो शहरी जीवन को छोड़ कर लोग गाँव की ओर मुड़ा करते है।

ये हालात देख ओर ऐ नादान इंसान समझ,
यहाँ कुछ भी तेरे बस में नही।
क्यों तेरा मेरा करता है, धन जोड़ जोड़ घर भरता है,
तेरे अपनो के सिवा कुछ भी तेरा सच में नही।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले
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