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ज़हन की बहस, दिल का ठहराव.

Rohit Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            राय का जुदा होना तो एक रवायत है
        
                                                    
                            
इस दुनिया की,
तुम अलग मोड़ पर खड़े हो,
मैं अलग डगर पर चलता हूँ।
ज़हन की इस बहस को भला दिल पर
क्यों लेना,
तुम अपनी जगह मुकम्मल हो,
मैं अपनी सोच में ढलता हूँ।

मतभेद की धूल तो महज़ एक तेज़ हवा
का झोंका है,
ज़रा सी माफ़ी की बारिश हो...
तो पल में साफ़ हो जाती है।
मगर जो 'मनभेद' की गिरह पड़ जाए
इस कच्चे तागे पर,
तो सदियों की वो साझी धूप,
एक पल में ख़ाक हो जाती है।

चलो ना,
आज शिकवों की सारी सिलवटें मिटा देते हैं,
जो बात चुभी थी दिल में,
उसे ज़ुबाँ पर लाकर हँस देते हैं।
राय बदलती रहती है,
ये वक़्त के बहते दरिया जैसी है,
रिश्तों के इस आईने में...
आओ कोई धुंध न रहने दें।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
2 महीने पहले
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