आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ज़हन की बहस, दिल का ठहराव.

                
                                                         
                            राय का जुदा होना तो एक रवायत है
                                                                 
                            
इस दुनिया की,
तुम अलग मोड़ पर खड़े हो,
मैं अलग डगर पर चलता हूँ।
ज़हन की इस बहस को भला दिल पर
क्यों लेना,
तुम अपनी जगह मुकम्मल हो,
मैं अपनी सोच में ढलता हूँ।

मतभेद की धूल तो महज़ एक तेज़ हवा
का झोंका है,
ज़रा सी माफ़ी की बारिश हो...
तो पल में साफ़ हो जाती है।
मगर जो 'मनभेद' की गिरह पड़ जाए
इस कच्चे तागे पर,
तो सदियों की वो साझी धूप,
एक पल में ख़ाक हो जाती है।

चलो ना,
आज शिकवों की सारी सिलवटें मिटा देते हैं,
जो बात चुभी थी दिल में,
उसे ज़ुबाँ पर लाकर हँस देते हैं।
राय बदलती रहती है,
ये वक़्त के बहते दरिया जैसी है,
रिश्तों के इस आईने में...
आओ कोई धुंध न रहने दें।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर