लद्दाख की हुंकार:
मरुभूमि में हिम स्तूप बनाया,
विश्व बीच भारत चमकाया।
ज्ञान-विज्ञान की अलख जगाई,
लद्दाख घाटी में रौनक आई।
पर घाटी पर संकट आया,
कॉर्पोरेट ने जाल बिछाया।
छठवीं अनुसूची की थी आस,
शासन ने कर दिया निरास।
मातृभूमि हित पाँव बढ़ाया,
दिल्ली बॉर्डर पर दल आया।
अमन-शान्ति का सन्देशा लाया,
पर शासन ने पहरा बिठाया।
वीर पुत्र को मार्ग में रोका,
लोकतंत्र को दिया यह धोखा।
किए नजरबंद वीर हमारे,
सह ना पाए कष्ट बेचारे।
अन्न त्यागा और नीर भी त्यागा,
सोया धरा पै संकट-भागा।
राज-दंड का रोब दिखाया,
पर वो सिंह जरा न डिगाया।
तप की ज्वाला धीमे सुलगे,
दिल्ली के सब हाकिम दहले।
शारीरिक कष्टों को झेला,
खड़ा रहा वो वीर अकेला।
अमर उजाला बनकर छाए,
जन-जन तक यह बात पहुँचाए।
तख्त हिलेगा हुंकार उठेगी,
न्याय की पावन ज्योत जगेगी।
जीतेगा लद्दाख का शेर,
मिटेगा शासकीय यह अंधेर।
सत्य की ताकत जीत दिखाए,
इतिहास सदा उसका गुण गाए।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'