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कविता :- माटी का महायोद्धा

Rohit Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जेठ की जलती दुपहरी जिसे कभी न डराती है,
        
                                                    
                            
वो तपती धूप भी जिसके हौसले से हार जाती है।कँपकँपाती सर्द रातें इस वीर का कुछ न कर पाती हैं,
वो हाड़-कँपाती ठंड भी जिसकी लगन से ठिठुर जाती है।

रिमझिम बरसती सावन की बूँदें जिसे सदा हर्षाती हैं,
वो मूसलाधार बारिश भी जिसके संकल्प से सहम जाती है।
पसीने की हर एक बूँद जिसकी ख़ुद मोती बन जाती है,
वो बंजर पड़ी सूखी माटी भी सोना यहाँ उपजाती है।


मेहनत जिसकी , चीर कर धरती को ,अन्न का दाना उगाती है,
वो किसान की मेहनत ही पूरे देश का पेट भर पाती है।
बदहाली और कर्ज़ की मार भी जिसे कभी न झुकाती है,
वो मज़बूत उम्मीद ही हर एक ख़िज़ाँ में बहार लाती है।

जिसकी मेहनत छालों भरे हाथों में हल की साख बचाती है,
जिसकी सच्ची मेहनत से ही माटी अपना मान बढ़ाती है।
अन्नदाता की वो सूरत जो हर एक मौसम में मुस्कुराती है,
वो किसान की निष्ठा ही इस पावन देश की शान कहलाती है
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
एक महीने पहले
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