हैवानियत का साया पसरा,
इंसानियत का आँचल बिखरा,
हर तरफ़ चीखें गूँज रही हैं,
कैसा ये खूनी दौर उभरा।
अपराध का हर दिन शोर यहाँ,
रिश्तों का बदलता दौर यहाँ,
अखबार लहू से भीग रहे ,
अंधेरा हैं छाया घोर यहाँ ।
यहाँ क्या से क्या अब हो रहा,
इंसान होश क्यों खो रहा,
जो अब तक था रक्षक सबका,
वह कत्ल सरेआम पिरो रहा।
पत्थर के दिल अब जाग उठे,
सद्भाव के पंछी भाग उठे,
विश्वास का गला घोंट कर अब,
सब पाप की चादर तान उठे।
मासूम की रक्षा कौन करे,
इस गिरते वक़्त में कौन लड़े,
जब रक्षक ही भक्षक बन बैठे,
तो न्याय की सीढ़ी कौन चढ़े।
— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'