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अग्नि-परीक्षा

Rohit Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तप रहा जो मौन रहकर, उस सवेरे को नमन,
        
                                                    
                            
जो मिटाता है तिमिर को, उस सुनहरे को नमन।
किंतु इस पावन डगर में, छल खड़ा अवरोध बन,
योग्यता की साँस पर अब, चल रहा यह वज्र-तन।

रात भर आँखों में रहकर, जो विमल सपने पले,
वे अचानक ही कुहासे की, कठिन आँच में जले।
श्रम यहाँ निस्तेज बैठा, न्याय की इस पीठ पर,
बिक रहा संकल्प देखो, आज चंद रुपयों के घर।

काटकर निज रक्त का कण, जिसने सींची थी धरा,
आज उसका ही भरोसा, हो गया है अधमरा।
पितु-मातु की मौन सिसकी, पूछती यह प्रश्न अब,
इस कठिन आंध्यार का, अवसान आख़िर होगा कब?

यह बिना शस्त्रों का रण है, बुद्धि की ही धार है,
लेखनी की शक्ति ही तो, इस तिमिर पर वार है।
क्रोध को संयम बनाकर, सत्य पथ पर चलना है,
बिना कोलाहल किए ही, भाग्य अपना बदलना है।

एक दिन यह भोर जागे, शुचिता का संबल मिले,
मेहनत की इस धरा पर, न्याय के पंकज खिलें।
धैर्य ही हुंकार अपनी, मौन ही हुंकार हो,
कलम की इस धार से ही, भोर का सत्कार हो।

— रोहित शर्मा भारद्वाज 'नादिर'
एक महीने पहले
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