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पंछी बन जाऊं

Rohit Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            देखूँ जब भी पंछी को,
        
                                                    
                            
ख़याल ये मन में आता है—

नहीं कह पाते हमसे कुछ ये,
पर उनकी भी कोई अभिलाषा होगी।
करते होंगे ये भी बातें आपस में,
इनकी भी कोई भाषा होगी।

काश, ऐसा हो जाए—
पंछी बन उनकी भाषा जानूँ,
कैसा होता है उनका जीवन?
सारी उनकी अभिलाषा जानूँ।

उड़ते, लहराते जब वे विशाल गगन में,
देख उनको उठते सवाल मेरे जहन में -

क्या ये भी इंसानों के जैसे
बाँधते गगन को सीमाओं में हैं?
पर देखता जब मैं इनको,
ये तो उड़ते हर विमाओं में हैं।
एक महीने पहले
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