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अभी कुछ ही वक्त पहले की बात है

Rishabh Bhatt

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अभी कुछ ही वक्त पहले की बात है,
        
                                                    
                            
महीनों इश्क़ संयोग श्रृंगार में
डूब रंगरलिया मना रहता था,

और आज वियोग श्रृंगार की घणी में,
दिल अकेला है, साँसे थमी हुई हैं
और बसंती बेलें पतझड़ का रुख कर चुकी हैं,

दोनों ही इश्क़ के पहलू हैं,
तो दोनों में इतना अंतर क्यों?
एक जन्म है तो दूसरा मृत्यु। कान्हा कहते हैं,
जन्म की तरह मृत्यु भी तो एक उत्सव है।

इसलिए मनाना होगा,
इस वियोग श्रृंगार को भी,
उसी उल्लास से जैसे
अबतक संयोग श्रृंगार को मनाया।

– ऋषभ भट्ट
3 महीने पहले
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