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तूलिका रख निज करो में

Rishabh Bhatt

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अमा ले रही प्रस्थान,
        
                                                    
                            
हे हृदय के कलुष तुम भी जलो,
मलय की वात से पथ मोड,
मोम के बंधन गलो,

तूलिका रख निज करो में,
व्यथा का व्याख्यान देता चितेरा,
ऊषा की हास रोलियों से,
मिटा दो, प्रस्थान ले अंधेरा,

यह प्रस्थान उल्लास हो,
विक्षत उच्छवास के अंतर्पथ में,
अविरल प्रमन दिशा देखे,
शाश्वत, रजत हास रथ में,

मेघवन में बटोरती,
अभिराम चित्र छाया,
यह रति के अंश हैं?
या कंदर्प की घोर माया,

मलयज की, कनक की,
घन तिमिर में विकसता गात,
चंद्रिका की कांति को बुझाती,
पल–पल प्रस्थान की यह रात।
– ऋषभ भट्ट
3 महीने पहले
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