तेरी रूहों को चैन आएगी क्या, जब कोई और छुएगा तुम्हें?
तू मुझे भूल पाएगी क्या, जब कोई और छुएगा तुम्हें?
रफ्ता रफ्ता दिल ने विदा ले लिया जहां की शाखो–शान से,
तू भी उससे रफ्ता कर पाएगी क्या, जब कोई और छुएगा तुम्हें?
जैसे सुलाया था तूने खुद को किसी मौसम की तरह मुझपे,
जुनू तब भी खिल पाएगी क्या, जब कोई और छुएगा तुम्हें?
यूं तो कहते थे, तुम्हें नींद मेरी बाहों के सिवा कहीं आती नहीं,
संग उसके भी सो पाओगी क्या, जब कोई और छुएगा तुम्हें?
बातें, जो बिना सोचे समझे बोल देती थी मुझे,
उससे भी कह पाओगी क्या, जब कोई और छुएगा तुम्हें?
तुम्हारे रग–रग के हर राज़ से वाकिफ था मैं,
हमराज उसको भी बनाओगी क्या, जब कोई और छुएगा तुम्हें?