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भले दो चार दिन थे

Rishabh Bhatt

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इश्क़ दो पल के हमारे,
        
                                                    
                            
दर्द सारी उम्र की है,
फासले दो कदम के हैं,
और दूरियां ज़िंदगी भर की हैं,

हमीं उम्मीद थे,
उम्मीदों में सामना था,
भले दो–चार दिन थे,
जमाना था...।

किसी को छुके–
जब रौशनी ढल जाती है,
मोमबत्तियां इक–इक कर,
पिघल जाती हैं,

जिस्म को वो मिजाज़ –
आजमाना था,
भले दो–चार दिन थे,
जमाना था...।

कल अगर ख़्वाबों की लौ,
बिन बात बुझ जाए,
झपकियां आ–आ कर,
मेरी नींदें चुराएं,

मेरी उम्मीदों को मरा कहना,
दिल मुझको ही लगाना था,
भले दो–चार दिन थे,
जमाना था...।

खूबसूरती पे उछल
जवानी बह जाती है,
होंठों से आजकल
कहानी बह जाती है,

गमों का हर किस्सा,
बेशक छुपाना था,
भले दो–चार दिन थे,
जमाना था...।

मत कर ख़ौफ़,
तू मेरे मुंतशिर होने से यार,
इश्क़ में मरते हैं,
आशिक हमेशा दो–चार,

छोड़कर न गई होती,
अगर मुझको बचाना था,
भले दो–चार दिन थे,
जमाना था...।

काफिला तू मेरे दिल का,
फिर सफर मुझको मिले न मिले,
सींचना मेरा काम है,
कोई फूल चाहें खिले न खिले,

दरख़्तों को इन रुखसत में,
तुम्हें ही काट जाना था,
भले दो–चार दिन थे,
जमाना था...।
– ऋषभ भट्ट
7 महीने पहले
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