ख्वाबों में जो दरार आई थी उन्हें सुई धागे से सिल देना,
अब अगर आओ तो आने से पहले इजाजत लेना,
वो दौर अलग था तुम्हारी आहटों से दरवाजे खुल उठते थें,
कुंडी बदल दी है मैंने, अब आना तो आवाज लगा देना,
तुम्हारी याद नहीं आती ये बात सच है,
तुम तो खो चुकी हो, अब खयालों में भी क्या खोना?
बाहों में रात अब भी है, तुम्हारी नहीं, अकेलेपन की,
सोने से पहले कभी तुमने कहा था – ‘शर्ट उतार देना’,
कोशिशें तो लाख की मगर कुछ हुआ नहीं,
हां मालूम है – होता वही है जो होता है होना,
चांद ने चुटकी लेते हुए कल चांदनी से कहा,
अजीब आदत है इंसानों की तस्वीर लेके सोना,
जरा तशरीफ रख तू ऐ दिल मुस्कुराहटों में,
मेरी तो आदत है बिन आंसुओं के रोना।
– ऋषभ भट्ट