स्वर्ण मृग के खातिर
भागे राघव चाप धरे,
मायापति माया वश में
पंचवटी में भटक रहे,
कर धर धनुष धरे
साध बाण मारीच मरे,
'हाय! लक्ष्मण हाय! सीता',
है मिथ्या चिल्कार करे
स्तब्ध राम ही दौड़ उठे
सम्मुख लखन उद्विग्न हुए,
त्रास हृदय में, सौ प्रश्न उठे
किधर कैसे होगी वैदेही?
'हाय विधाता' राम चित्कार करे,
धनु धरणी में जा खिसका
राम विलाप कर चित्कार करे
लखन व्यथित हुए
राम रुदन देख,
धैर्य धर भ्राता
यही साहरा है,
'निश्चिंत रहो हे रघुराई
माता होंगी कुशल भलाई',
विक्षिप्त हुए चित्कार करे
हे मृग-खग ठौर बता॥३॥
आर्द नयन से रुदन करे,
हृदयाघात न सहन करे,
निज उर भाव से
पूछे रघुराई,
तुम बिन कौन सहारा है?
रोते राम, हँसती नियती
लीला राम की अविरल है।