विज्ञापन

पेड़ों पर जब तक पत्ती हैं

Rinkee goswami

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पेड़ों पर जब तक पत्ती हैं, तब तक वो पत्ती पत्ती हैं।
        
                                                    
                            
हो गई अलग गर पेड़ों से, कूड़ा करकट हो जाती हैं।

महफूज़ हो केवल अपनो में, महसूस करो महफूजी को
हो गए अलग गर अपनो से,औकात तेरी भी रत्ती है।
पेड़ों पर जब तक ......................................।
हो गई अलग गर पेड़ों ..................................।

मत अहम करो तुम दौलत पर,ये तो आती जाती है।
पर छूट समय गर जाएगा, तो केवल रेत की सुत्ती है।
पेड़ों पर जब तक .....................................।
हो गई अलग गर पेड़ों ................................।

बिखरे रिश्तों की गहराई में, उथलापन आ जाता है।
सम्भल गए तो संभल गए,वरना तो राख की भट्ठी है।
पेड़ों पर जब तक ....................................।
हो गई अलग गर पेड़ों ...............................।

मत भटकों लेकर सपनों को, ऐसे मंजिल न मिलती है।
मिलते नहीं सहज ही मोती,ये तो सागर की मस्ती है।
पेड़ों पर जब तक ....................................... ।
हो गई अलग गर पेड़ों ...............................।

घर एक अकेला जंगल में,न शेर कभी भी बनाता है।
बंट बंट के टुकड़ों टुकड़ों में, न बनती कभी भी बस्ती है।
पेड़ों पर जब तक........................................... ।
हो गई अलग गर पेड़ों ....................................।

गर आज दुखों का साया है,तो कल बादल छट जाएंगे।
रोते क्यों हो आज में अपने,कल क्या कोई छुट्टी है।
पेड़ों पर जब तक ........................................।
हो गई अलग गर पेड़ों..................................।

 
3 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Manju Sharma

3561 कविताएं

View Profile