विज्ञापन

अजब व्यवस्था का यह ढाँचा बेकाबू है!

Review wala

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            (एकं समाचार पर आधारित है )
        
                                                    
                            
*विकास की लिफ्ट में फंसे युवा ,Bed,BTech MSc के बाद स्कूलों में पियोन का काम कर रहे हैं*

डिग्री का ‘चपरासीकरण’: एक सरकारी गाथा
डिग्री की फ़ाइल बांधकर, कंधों पर टांगा झोला,
सरकारी दफ़्तर में आई एक नई 'सफ़ाई-वाली'।
हाथ में झाड़ू, जेब में चॉक, आँखों में गहरा ज्ञान,
पद चतुर्थ श्रेणी मिला, पर हुनर है सीना तान!
एम.एससी. की डिग्री बोली—
"मैं पानी भरकर लाऊँगी,
साहब की मेज सजाऊँगी,
पर घंटी बजते ही क्लास में जाकर,
न्यूटन का नियम पढ़ाऊँगी!"
बी.एड. का डिप्लोमा हँसकर बोला—
"क़िस्मत का अजब तराना है,
घंटी भी मुझे बजानी है,
बच्चों को भी सिखाना है।
अटेंडेंस का रजिस्टर खोल,
एल.डी.सी. का बाबू बन जाऊँ,
एक तनख्वाह में तीन-तीन पदों का,
फ़र्ज़ बख़ूबी मैं निभाऊँ!"
इंजीनियर साहब बैठे हैं,
फ़ाइलों की धूल उड़ाते हुए,
कोडिंग के सारे अल्गोरिदम,
बाबू के कंप्यूटर पर लगाते हुए।
"सरवर डाउन है? लाओ मैं ठीक कर दूँ,
एक्सेल की शीट चुटकी में भर दूँ,
बस चाय का कप खाली न रहे,
साहब का हुक्म है—हाजिरी भर दूँ!"
व्यवस्था का अजब खेल देखिए जनाब:
चपरासी करे अध्यापन,
बाबू करे आराम,
डिग्रियों की नीलामी में,
पियोन संभाले तमाम काम!
सिस्टम मुस्कुरा कर कहता है—
"वाह! बजट की बचत भारी है,
एक पियोन की भर्ती में,
पूरी फैकल्टी सरकारी है!"
डिग्रियाँ अलमारी के कोने में,
अब चुपचाप मुस्काती हैं,
जब घंटी बजाते हाथों से,
बोर्ड पर समीकरण लिख जाती हैं।
युवा भारत का सपना देखो,
सरकारी मोहर का जादू है,
झाड़ू थामे वैज्ञानिक घूमे,
अजब व्यवस्था का यह ढाँचा बेकाबू है!,,
एक घंटा पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Manoj Kumar

428 कविताएं

View Profile

Sanjai kumar

103 कविताएं

View Profile