दशहरे के अवसर पर ....
सफ़लता और जलेबी का मोल
सफ़लता कोई जलेबी नहीं, जिसको चूसें आप,
ये मीठा-मसालेदार अनुभव है, जो बनाए आपको लाजवाब।
जलेबी की तरह गोल-गोल, घूमता है इसका रास्ता,
कभी मीठा तो कभी तीखा, हर मोड़ पर नए चौंका।
जलेबी की मिठास पर मत जाना, सफ़लता का है अलग ही फसाना,
यह मेहनत और परिश्रम का है नतीजा, चुस्की नहीं, पूरा है जंग का मजा।
चाशनी में डूबी जलेबी जब तक चूसे, पर सफ़लता चूसने से नहीं आती,
यह तो संघर्ष और हिम्मत का परिणाम है, जो हर दिन का संघर्ष बताती।
जलेबी का स्वाद तुरंत मिलता, पर सफ़लता का स्वाद धीरज मांगता,
यह किसी दुकान की चीज़ नहीं, यह तो समय और साधना का फल है।
जब आप सफ़लता की चाह में निकल पड़ते, तो जलेबी की तरह ना मुड़ें वापस,
रास्ते में आएं कांटे, तो उन्हें चूसें नहीं, बल्कि मेटल का मन बनाएं आप।
सफ़लता कोई जलेबी नहीं, यह तो मेहनत का मीठा फल है,
यह चूसने से नहीं मिलता, यह तो पसीने की बूंदों में पलता है।
जब आप सफ़लता की राह पर चलते, तो जलेबी की मिठास को भूलें,
क्योंकि यह सफ़र है तपस्या का, जिसमें आपको संघर्ष को अपनाना होगा।
जलेबी की खुशबू तो हर कोई पसंद करता, पर सफ़लता का रास्ता हर कोई नहीं पकड़ता,
क्योंकि यह तो मेहनत का फल है, जिसे पाने में समय लगता।
तो सफ़लता को चूसने की न सोचें, यह कोई जलेबी नहीं,
यह तो मेहनत, धीरज, और संकल्प का मोल है, जिसे पाने में लगेगी पूरी ताकत आपकी।
जलेबी की मिठास का मजा लें, पर सफ़लता की चाह में डूबें,
यह मीठा फल तभी मिलेगा, जब आप मेहनत में पूरी तरह से झूमें।
-रमेश मेंदीरत्ता