देश में गर्मी, धूल, और ट्रैफिक का जाल,
बोले शर्मा जी — "अब नहीं सहा जाता ये हाल!"
"विदेश चलो, वहाँ सब कुछ है कमाल,
यहाँ तो बस है भ्रष्टाचार और बवाल।"
भारत से निकले, बोले — "बस बहुत हुआ!"
"हर गली में गड्ढा, हर नेता झूठा,
हर योजना अधूरी, हर सड़क टूटी-फूटी।
यहाँ तो कोई नियम नहीं मानता,
हर कोई बस अपना उल्लू सीधा करता जाता।"
अमेरिका पहुँचे, बोले — "अब चैन आएगा!"
"यहाँ तो सब कुछ डिजिटल, सब कुछ स्मार्ट,
कोई लाइन नहीं, कोई घूस नहीं, सब कुछ है आर्ट!"
पर टैक्स देखा तो आँखें फटी की फटी,
"इतना टैक्स? अरे भारत में तो फिर भी कुछ बचती पेंशन की पोटली!"
"बर्गर खा-खा के पेट हुआ खराब,
अब समझ आया क्यों दादी कहती थी — खा लो घर का सादा खिचड़ी-चावल जनाब।"
इंग्लैंड पहुँचे, बोले — "अब तो रॉयल लाइफ!"
"यहाँ की बारिश, यहाँ की चाय — वाह क्या बात है!"
पर सूरज के दर्शन दुर्लभ, हर दिन बादल की बारात है।
"यहाँ तो लोग 'सॉरी' बोलते हैं हर बात पर,
पर दिल में क्या है, वो समझ नहीं आता हर बात पर।"
जापान पहुँचे, बोले — "डिसिप्लिन का देश है ये!"
"हर चीज़ समय पर, हर काम में परफेक्शन,
यहाँ तो ट्रेन भी सेकंड में चलती है, क्या कनेक्शन!"
पर जब ओवरटाइम में फंसे, और बॉस ने कहा — "काम करो और हँसते रहो,"
तो बोले — "भारत में बॉस गाली देता था, पर छुट्टी तो देता था, ओह!"
फ्रांस पहुँचे, बोले — "अब तो कला का आनंद लेंगे!"
"पेरिस की गलियाँ, वाइन और चीज़,
यहाँ तो हर कोना है जैसे कोई आर्ट की चीज़!"
पर जब भाषा बनी दीवार, और बेकरी में मिला कुछ अजीब,
तो बोले — "समोसे और चाय की बात ही कुछ और थी, ये क्रोइसां क्या चीज़?"
ऑस्ट्रेलिया पहुँचे, बोले — "यहाँ तो सब मस्त है!"
"बीच, BBQ, और कंगारू — क्या लाइफ है बेस्ट है!"
पर जब देखा — "यहाँ भी लोग रेसिस्ट हैं कहीं-कहीं,
और घर का किराया इतना कि EMI याद आ गई वहीं।"
कनाडा पहुँचे, बोले — "अब तो बस यहीं बसेंगे!"
"स्नोफॉल में सेल्फी, और मेपल सिरप की मिठास,
यहाँ तो हर मौसम में है कुछ खास!"
पर जब बर्फ़ में फिसले और गिरे धड़ाम,
तो बोले — "दिल्ली की धूप ही थी असली आराम।"
अंत में लौटे भारत, बोले — "घर जैसा कुछ नहीं!"
"हाँ, यहाँ भीड़ है, हाँ, यहाँ शोर है,
पर यहाँ दिल है, अपनापन है, और कुछ और है।
विदेश में सुख है, पर सुकून नहीं,
यहाँ की चाय, मोहल्ले की गप्पें — वो कहीं नहीं।"
दुनिया घूम ली, सुख ढूँढा हर कोने में,
पर जो अपनापन है अपने देश के टोले में,
वो ना पेरिस की गलियों में, ना न्यूयॉर्क की रौशनी में,
ना टोक्यो की ट्रेन में, ना लंदन की बारिश में।
देश की समस्याएँ हैं, पर देश भी तो अपना है,
सुधारो, सँवारो, भागो मत — यही असली सपना है।
-रमेश मेंदीरत्ता