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घर भी एक मंच है

Anonymous User

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रात की निराशा फिर लौटती,
        
                                                    
                            
दिन का जगमग, खेल रूके।
मैं भी अपने घर लौटता,
हर कोना खाली-खाली लगे।

जितना देखूँ, नीर बहता,
मन का सूनापन कुछ कहता।
ये देख बाज़ीगर भी जैसे
मंच सजने का इंतज़ार करता।

दिन की लालिमा मंच सजाए,
नाटककार रंग बरसाए।
जीवन फिर से रंग दिखाए,
घर की याद कहीं खो जाए।

लगता है, घर भी मंच ही होता,
हर चेहरा अपना किरदार होता।
सर्दी के बाद गर्मी आए,
सूनी डाल पर फूल खिलाए।

माली बनकर बाग को सींचें,
मालिक बनकर घर को देखें।
हर कोने को प्रेम से महकाएँ,
जिधर भी जाएँ, जब भी जाएँ।

फिर घर सुंदर-सुंदर लगे
मन को अपना-अपना लगे।
खुद के मिलन से फिर न भागे
कुछ बुरा भी अच्छा लागे ।
एक महीने पहले
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Manju Sharma

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