रात भर जलते हुए चिराग़ों को कोई राह नहीं मिलती,
किताबों में खोई जवानी को कोई पनाह नहीं मिलती
डिग्रियाँ जेब में रखकर दर-ब-दर फिरते हैं हम,
ज़िंदगी गुज़र गई, पर कोई पहचान नहीं मिलती।
ट्रेनों की भीड़ में लटककर जाते हैं इम्तिहाँ देने,
हम मुसाफ़िरों के दर्द की कोई दास्तान नहीं मिलती।
रात-दिन जाग कर जो सींची थी उम्मीदों की फ़सल,
लीक पर्चों के बाज़ार में वो नीलाम नहीं मिलती,
उम्र ढलती जा रही है, बाप की आँखें हैं नम,
घर के छोटे चिराग़ को वो मुस्कान नहीं मिलती।
काग़ज़ों के शहर में हर 'राही' ढूँढता है अपना हक़,
सब बिका है यहाँ, बस मेहनत की कोई शाम नहीं मिलती.......