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अर्जुनविषाद (भगवाद्द गीता का भाग )दुरंत

Reena Mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अर्जुन ने कहा हे माधव मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच ले चलो मैं दोनों पक्षों के योद्धाओं को देखना चाहता हूं,
        
                                                    
                            

जब रथ आ खड़ा हुआ दोनों सेनाओं के बीच,
चकित अर्जुन देख रहा दिव्य नजरों से विनाश विकराल
दुरंत स्वजनों का देख पड़ने लगे विषाद में अर्जुन,
युद्ध के लिए हो रहे शंखनाद बज रहे नगाड़े, भेरी ढ़ोल
घड़ी घड़ियाल गुंजयमय है धरती और आसमान|

अपने प्रियजनों को देखकर कुंती पुत्र अर्जुन अत्यंत करुणा से भर गए,
युद्ध से होता कुल का नाश है,ना मुझे विजय चाहिए, ना राज्य और ना ही सुख तोले मन क्या हानि क्या लाभ,
कुल का नाश करने वाले को नरक प्राप्त होता है |
देने लगे अर्जुन धर्म ज्ञान जो कृष्ण को,
जिन मनुष्यों के कुल धर्म नष्ट हो जाते है,
उनका निश्चित रूप से पतन होता है,

अर्जुन के हाँथो जब छूटा गांडीव धनुष किया प्रहार मायाजालों ने, जला रही त्वचा भ्रमित हो रही चाल,
विचलित मन देख रहा यमराज का रूप विकराल,

देख रहे श्री कृष्ण- करुणा से व्याकूल आँसुओ से भरी आँखों
वाले शौकग्रस्त अर्जुन को,
जब अंतिम शब्द कहे "मैं युद्ध नहीं करूँगा" और मौन हो गए अर्जुन,
तब श्री कृष्ण ने हल्की मुस्कान के साथ बोलना आरंभ किया
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्॥

ऐसा कभी नहीं था कि मैं नहीं था, तुम नहीं थे, या ये राजा नहीं थे। और ऐसा भी कभी नहीं होगा कि आगे चलकर हम सब अस्तित्व में न रहें।
2 महीने पहले
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