हुए तर-बतर अफसाने अकीदत के
ज़माने गाते रहे वो नगमे फसादत के
दिले नादान तेरी फितरत नागवार फिर भी
क्योंकर जड़ें गये किस्से बिगड़ी आदत के
जब रातें रंगीन थी सुबह से रिश्ता न था
अब ख़याल आते हैं उस की इबादत के
यूं तो ज़र्रे भी जी लेतें है अपना इक पल
किसलिए गाते रहे मऱसिये अपनी किस्मत के
'रवि' चल अब तो शाम ढलने को आ गई
छोड़ दे वो किस्से तेरी अंधेरी अबादत के
-कवि 'रवि'