जीवन है कुछ पल का,
पता है सबको,
फिर भी है घमण्डता ।
हे मानव क्यूं करता है घमण्ड,
पता है तुझको,
कि तेरा,
फुलो जैसा सुंदर मुखडा,
मिठी बोली कोयल जैसी,
कबीर जैसी वाणी तेरी,
मोती जैसे चमकीले दांत तेरे,
लक्ष्मी माता जैसे बाल तेरे,
नयन तेरे मीन जैसे,
चाल तेरी हिरण जैसी,
भगवान कृष्ण जैसा आकर्षक शरीर तेरा,
बल तेरे में हनुमानजी जैसा,
मिल जायेंगे यह एक दिन,
धूल के कण के साथ,
फिर भी क्यू करता है धमण्ड ,
किसलीए करता है घमण्ड ।
हे मानव चल पड़ेगा तु तो,
रह जाएगा सब पिछे तेरा,
धन दोलत तेरी,
तेरा पुरा परिवार,
यही रह जाएगा कुटुंब कबीला,
निकल पडेगी आत्मा तेरी,
बिना पुछे एक बार,
हे मानव क्यू करता है घमण्ड,
पता है तुझको,
फिर भी,
क्यूं करता है, घमण्ड।
हे मानव क्यू करता है, घमण्ड,
पता है तुमको,
होगा ऐसा जीवन में;
फिर भी घमण्डता,
पर क्यूं ।
हे मानव क्यू करता है घमण्ड,
सर्व गुणो से सम्पन्न शरीर तेरा,
एक दिन हवा बन जाएगा,
फिर भी घमण्ड क्यूं,
घमण्डता क्यूं........ ।
-रविन्द्र एन प्रजापति