दृष्टि बदले दशा बदले
न जाने क्यों लोग हमसे अनायास नाराज़ हैं,
शायद हमारा मुस्कुराना अच्छा नहीं लगता
सबको खुश करना मेरे वश का नहीं
लोग हमें खुश करें कोई ज़रूरी तो नहीं
दृष्टि बदले दशा बदले दिशा बदलती है
दायाँ बायाँ निरपेक्ष सब कुछ सापेक्ष है
आईना एक समय में एक चेहरा दिखता है
पल पल एक चेहरा बताता एक छुपाता जाता है
स्वयं से सुलह हो जाए,
जब मन मुस्कुराना सीख जाए,
तो हर दिन उत्सव है
जो है 'रकुमि' उसी में संतोष है
यही जीवन का सहज सरल विश्वास है।
~ रवीन्द्र कुमार मिश्र