नदियों का पहाड़ों को चीरना, झरना, बहना,
सरल-सहज विस्तार है प्रकृति का अपना।
किसी का एकाधिकार नहीं पढ़ना-पढ़ाना,
सीखना-सिखाना, आगे बढ़ना-बढ़ाना।
बारिश के बाद बादलों के बीच से
सूरज का झाँकना, किरणों का बिखरना,
हवा के संग गोधूलि की गंध का आना,
बीज का मिट्टी में प्रस्फुटित होना, वृक्ष बन जाना।
ज्ञान की कक्षा का परिसर-विहीन हो जाना,
सपनों का बंद किवाड़ों से बाहर निकल जाना।
जो आज सीखा, कल औरों को सिखाना,
हर पंख को मिले उन्मुक्त गगन में उड़ना।
पढ़ना-पढ़ाना, सीखना-सिखाना, अलख जगाना,
दीये से दीया जलाना, ज्ञान की लौ से अँधेरा मिटाना।
ब्रह्मांड में व्याप्त जड़-चेतन का बोध कराना,
महज़ पेशा नहीं, जुनून बन जाना।
अवसर का लाभ उठाना, सपना अपना बनाना,
किसी का एकाधिकार नहीं पढ़ना-पढ़ाना।
~ रवीन्द्र कुमार मिश्र