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बहता पानी.

Ravi Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बहते हुए पानी ने पत्थरों पर निशान छोड़े हैं,
        
                                                    
                            
अजीब बात है,
पत्थरों ने पानी पर कोई निशान नहीं छोड़े।
शायद बहना ही पानी की नियति थी,
और ठहरना पत्थरों की आदत,
एक चलता रहा अपनी धुन में,
दूसरा अपनी जगह पर खड़ा रहा।

पानी ने चोट नहीं की,
बस छूकर निकलता रहा,
पत्थर कठोर था बहुत,
फिर भी भीतर से घिसता रहा।

समय भी कुछ ऐसा ही है,
किसी को छूकर गुजर जाता है,
किसी को भीतर तक बदल जाता है,
और किसी को केवल याद बना जाता है।

जो रास्ते में बहता रहा,
उसने रास्तों को आकार दिया,
जो रास्ते में अड़ा रहा,
उसने बस अपना आकार बचाया।
अजीब बात है
जिसे अपना निशान छोड़ना था,
वह स्वयं मिटता चला गया!!!!

 
3 घंटे पहले
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