लाश बनि मजदूरन।
चाहे तो ले लो अंतिम
विकासशील सांस,
अगला स्टेशन, लाश।
शब्दों में कितना झांसा है,
सियासत ने सबको फाँसा है।
बोल पड़ी थी स्टेशन पर,
लाश बनी मजदूरन,
मेरी हत्या नहीं हुई,
मैं मरी खाके विकास का चूरन।
मेरा छोटा सा बच्चा,
छोड़ रही हूं जग में,
मांगेगा ये हिसाब जग से,
क्यों मां लाश बनी मजबूरन।
पगली मुझको बता रहा है,
लाशों पे बैठा शाशन,
चली आयी में बड़ी दूर से,
पर न पेट में पानी राशन।
निचोड़ दिया था दूध खून सब,
अपने दुधमुँहे की खातिर।
क्या गरीब मां पगली थी,
और तेरी माँ थी शातिर?
मैं तो मरी हूँ भूखी प्यासी,
विश्व गुरु भारत में,
प्लेटफॉर्म से शुरू हुई,
मेरी यात्रा यम के रथ में।
पर मेरी तस्वीर को
संसद के आगे रख देना,
बापू की प्रतिमा के आगे,
आंसू मेरे बरसेंगे।
दांडी के नमक से खारा,
आंसू मेरा होगा,
पर बापू मेरे बच्चे को बताना।
आज़ाद देश कब होगा?
जब भूख प्यास से नहीं मरेंगें,
मरे तो हत्या समझो.
गरीबी के सागर में,
कागज पर आज़ादी,
और हम सच पचा रहे मजबूरन,
खा विकास का चूरन।
डॉ रवि 'हाशिया'
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