1) दिल जनावर पे हार बैठे थे
ऐसे में हम शिकार क्या करते
2) मुस्कुराते दर्द के साथ है हम लेकिन
क्यों मेरी निगाहें ये भरी रहती है
3) बोल किस लिए ज़िक्र-ए-ज़हर यूँ सताती है
वो ख़याल में 'रौनक' रोज़-रोज़ आती है
4) ये रौशनी ज़रा कम कर दे
ये बाग़ को ज़रा नम कर दे
5) मैं उसको पहचान नहीं पाया तो क्या
याद उसे भी आया मेरा नाम कहाँ
6) हमें तो ज़ख्म ने भी ना कहा मुस्कुरा,,
क्यों मुस्कान भी ' रौनक ' मरी रहती है,,
7) क्या इस जिंदगी को अब बताएंगे हम,,
इसी के हाथ में तो अब छड़ी रहती हैं,,
8) नहीं चलता पता इस वक्त का आख़िर में,,
क्यों हो थाह ना कर में घड़ी रहती है,,
9) क्यों तू अब दिलों के दर खड़ी रहती है,,
क्यों यादें इधर आखें अरी रहती है,
:- रौनक कर्ण
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