जनवरी की सुबह-सी,
फ़रवरी के इश्क़-सी,
मार्च की बहार-सी,
और मौसम सँवर गया।
अप्रैल की बारिश-सी,
मई की पहली बूँद-सी,
जून की ठंडी छाँव-सी,
और दिल को क़रार आ गया।
जुलाई की घटा-सी,
अगस्त के तिरंगे-सी,
सितंबर की शाम-सी,
और हर लम्हा त्योहार हो गया।
वह आईं अक्टूबर के चाँद-सी,
नवंबर की उम्मीद-सी,
दिसंबर की धूप-सी,
और कैलेंडर बदल गया।
वह आईं तो लगा,
वक़्त ने करवट बदल ली,
जो ज़िंदगी गुज़र रही थी,
वह जीने का हुनर बन गई।
वह आईं तो सिर्फ़ तारीख़ें नहीं बदलीं,
मेरे भीतर का मौसम बदला,
और मैं जो ख़ुद से बिछड़ा था,
फिर से मेरा हो गया।
-रतन कुमार कैथवास