पिघलकर बहते लावे में, दरिया को कैसे डालूँ,
उसे तो समंदर से मिलने की ज़िद है,
ये कैसा अंतर्द्वंद् है, अब मैं क्या करूँ।
पहाड़ ने धीमे से मुझसे कहा,
"रास्ते बदल सकते हो, मंज़िल नहीं।
जिसकी रगों में समंदर लिखा हो,
उसे लावे की आग, कब तक रोक पाएगी?"
मैंने लावे से पूछा,
"तू इतना तपता क्यों है?"
वो बोला…
"मैं भी कभी पत्थर था,
वक़्त ने भीतर इतना दर्द भरा कि आग बन गया।"
दरिया मुस्कुराकर बोला,
"मुझे जलना नहीं, बहना आता है।
हर मोड़ पर, अपना रास्ता ख़ुद बनाना आता है।
अगर चट्टान मिली तो, उसे काट दूँगा,
अगर रेगिस्तान मिला तो, बादल बुला लूँगा।"
मैं फिर सोच में पड़ गया,
क्या आग को पानी से मिलाऊँ,
या पानी को उसकी मंज़िल तक जाने दूँ।
तभी हवा ने कान में कहा…
"ज़बरदस्ती से न नदियाँ मुड़ती हैं,
न तक़दीरें बदलती हैं।
जिसे समंदर से मिलना लिखा हो,
उसे रोकने वाले अक्सर ख़ुद किनारे रह जाते हैं।"
मैंने फिर लावे की ओर देखा,
उसकी तपिश अब भी वैसी ही थी,
मगर दरिया का यक़ीन उससे कहीं ज़्यादा गर्म था।
तब समझ आया…
आग का काम तपाना है,
दरिया का काम बहना है।
जो अपने स्वभाव से, समझौता कर ले,
वो न लावा रहता है, न दरिया रहता है।
-रतन कुमार कैथवास