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बदमिज़ाज ज्यादा हो गई ये बरसात तेरी

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बदमिज़ाज ज्यादा हो गई ये बरसात तेरी,
        
                                                    
                            
क्या इसे समझाया या नहीं, कोई बात मेरी।

कैसे बेमौसम सी हो गई ये बरसात तेरी,
सूखे दिल पर फिर बरस पड़ी सौगात तेरी।

कभी धूप बनके आती, कभी बादल बन जाती,
समझ नहीं आता कैसी है ये आदत तेरी।

रात भर खिड़की पे बूंदें दस्तक देती रहीं,
नींद से ज्यादा याद आई मुलाक़ात तेरी।

मैंने बादलों से पूछा, किसका इंतज़ार है,
हवा ने धीरे से कह दी सारी बात तेरी।

भीगता रहा मैं तेरी यादों के शहर में,
हर बूँद में महसूस हुई वही चाहत तेरी।

अब भीगने से डर नहीं, डर तो बस इतना है…
फिर कहीं बह न जाए दिल की सारी जज़्बात तेरी।

बदमिज़ाज ज्यादा हो गई ये बरसात तेरी,
फिर भी दिल को आज भी है बस आस तेरी।
-रतन कुमार कैथवास
8 घंटे पहले
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