विज्ञापन

यही सदियाँ कहेंगी

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            लिख सके तो लिख अभी,
        
                                                    
                            
ये हवाएँ क्या कहेंगी।
शोर बहुत, इसे शांत कर,
फिर ख़ामोशियाँ क्या कहेंगी।

स्याही सूखने से पहले,
दिल की हर तहरीर लिख।
वक़्त जब पन्ने पलटेगा,
अधूरी दास्ताँ क्या कहेगी।

एक परिंदा डाल पे बैठा,
साँझ से कुछ पूछ रहा था।
रात अगर बिन चाँद उतरी,
उसकी उड़ान क्या कहेगी।

माँ ने चौखट धोते-धोते,
आँचल से आकाश पोंछा।
बेटा जल्दी लौटे या देर से लौटे,
सूनी दहलीज़ क्या कहेगी।

जिस बरगद की छाँव तले हम,
सपनों का बाज़ार सजाते।
कल वो सूखा मिल गया तो,
जड़ों की प्यास क्या कहेगी।

आँसू केवल पानी नहीं हैं,
इनमें सदियों की भाषा है।
एक बूँद जो गिरकर ठहरी,
पूरी उम्र का राज़ कहेगी।

तूने अपने दर्द छुपाए,
सबको हँसकर राह दिखाई।
जब आईना सामने होगा,
तेरी थकी निगाह क्या कहेगी।
राख समेटे बैठा कोई,
अब भी घर की आस लगाए।
जलते कमरों की दीवारें,
उसकी फ़रियाद क्या कहेंगी।

नफ़रत की आवाज़ें ऊँची,
प्रेम मगर धीमे चलता है।
जब इतिहास लिखा जाएगा,
जीती हुई बाजी क्या कहेगी।

चल, कुछ ऐसे शब्द उकेरें,
जिनमें हर टूटा दिल बस जाए।
कल जब दुनिया उन्हें पढ़ेगी,
रूह की लौ फिर क्या कहेगी।

लिख सके तो लिख अभी,
ये हवाएँ क्या कहेंगी।
शोर अपने मन का थाम ले,
फिर ख़ामोशियाँ क्या कहेंगी।
नाम नहीं, एहसास बचा ले…
बस यही सदियाँ कहेंगी।
-रतन कुमार कैथवास
3 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Manju Sharma

3561 कविताएं

View Profile